Pratidin Ek Kavita

या देवि! | वीरेन डंगवाल

माथे पर एक आँख लम्बवत
उसके भी ऊपर मुकुट
बहुत सारे हाथ
मगर दीखते दो ही :
एक में टपकता मुंड।
दुसरे में टपटपाता खड्ग।
शेर नीचे खड़ा है।
दांत दिखाता, मगर सीधा - सादा।
बगल में नदी बह रही लहरदार।
पहाड़ क्या हैं, रामलीला का पर्दा हैं।
माता, मैं उस चित्रकार को प्रणाम करता हूँ
जिस ने तेरी यह धजा बनाई।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

या देवि! | वीरेन डंगवाल

माथे पर एक आँख लम्बवत
उसके भी ऊपर मुकुट
बहुत सारे हाथ
मगर दीखते दो ही :
एक में टपकता मुंड।
दुसरे में टपटपाता खड्ग।
शेर नीचे खड़ा है।
दांत दिखाता, मगर सीधा - सादा।
बगल में नदी बह रही लहरदार।
पहाड़ क्या हैं, रामलीला का पर्दा हैं।
माता, मैं उस चित्रकार को प्रणाम करता हूँ
जिस ने तेरी यह धजा बनाई।