Pratidin Ek Kavita

भवसागर | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी

इसी में बोना है अमर बीज
इसी में पाना है खोना है प्यार
भवसागर है यह संतों का
इसी में ढूंढ़ना है
निकलने का द्वार

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

भवसागर | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी

इसी में बोना है अमर बीज
इसी में पाना है खोना है प्यार
भवसागर है यह संतों का
इसी में ढूंढ़ना है
निकलने का द्वार