Pratidin Ek Kavita

मुझ से पहले। अहमद फ़राज़

मुझ से पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने
शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो
एक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायद
अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा हो
जज़ीरा: द्वीप

मैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा
बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा: जो प्रेम का वादा करके भूल गया हो
खो चुका है जो किसी और की रानाई में
शायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल में
और कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई में

मैं ने माना कि शब-ओ-रोज़ के हंगामों में
वक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता रफ़्ता
चाहे उम्मीद की शमएँ हों कि यादों के चराग़
मुस्तक़िल बोद बुझा देता है रफ़्ता रफ़्ता
शब-ओ-रोज़: रात-दिन; मुस्तक़िल: निरंतर; बोद : दूरी

फिर भी माज़ी का ख़याल आता है गाहे-गाहे
मुद्दतें दर्द की लौ कम तो नहीं कर सकतीं
ज़ख़्म भर जाएँ मगर दाग़ तो रह जाता है
दूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतीं
माज़ी: अतीत

ये भी मुमकिन है कि इक दिन वो पशेमाँ हो कर
तेरे पास आए ज़माने से किनारा कर ले
तू कि मासूम भी है ज़ूद-फ़रामोश भी है
उस की पैमाँ-शिकनी को भी गवारा कर ले
पशेमाँ: शर्मिंदा; ज़ूद-फ़रामोश: जल्दी भूलने वाला; ज़ूद-फ़रामोश: वादा तोड़ना

और मैं जिस ने तुझे अपना मसीहा समझा
एक ज़ख़्म और भी पहले की तरह सह जाऊँ
जिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैं
इसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँ

अहद-ए-वफ़ा: प्रेम में दिया गया वचन

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

मुझ से पहले। अहमद फ़राज़

मुझ से पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने
शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो
एक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायद
अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा हो
जज़ीरा: द्वीप

मैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा
बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा: जो प्रेम का वादा करके भूल गया हो
खो चुका है जो किसी और की रानाई में
शायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल में
और कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई में

मैं ने माना कि शब-ओ-रोज़ के हंगामों में
वक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता रफ़्ता
चाहे उम्मीद की शमएँ हों कि यादों के चराग़
मुस्तक़िल बोद बुझा देता है रफ़्ता रफ़्ता
शब-ओ-रोज़: रात-दिन; मुस्तक़िल: निरंतर; बोद : दूरी

फिर भी माज़ी का ख़याल आता है गाहे-गाहे
मुद्दतें दर्द की लौ कम तो नहीं कर सकतीं
ज़ख़्म भर जाएँ मगर दाग़ तो रह जाता है
दूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतीं
माज़ी: अतीत

ये भी मुमकिन है कि इक दिन वो पशेमाँ हो कर
तेरे पास आए ज़माने से किनारा कर ले
तू कि मासूम भी है ज़ूद-फ़रामोश भी है
उस की पैमाँ-शिकनी को भी गवारा कर ले
पशेमाँ: शर्मिंदा; ज़ूद-फ़रामोश: जल्दी भूलने वाला; ज़ूद-फ़रामोश: वादा तोड़ना

और मैं जिस ने तुझे अपना मसीहा समझा
एक ज़ख़्म और भी पहले की तरह सह जाऊँ
जिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैं
इसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँ

अहद-ए-वफ़ा: प्रेम में दिया गया वचन