Pratidin Ek Kavita

आँच | वंदना मिश्रा

गर्मियों में तेज़ आँच देखकर माँ कहती थी :

'आग अपने मायके आई है'
और फिर चूल्हे की लकड़ियाँ

कम कर दी जाती थीं
मैं कहती थी :

'मायके में तो
उसे अच्छे से रहने दो माँ

कम क्यों कर रही हो?'
माँ कहती थी :

'ये लड़की
प्रश्न बहुत पूछती है।'

बाद में समझ आया
प्रश्न पूछने से मना करना

आग कम करने की तरफ़
बढ़ा पहला क़दम होता है।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

आँच | वंदना मिश्रा

गर्मियों में तेज़ आँच देखकर माँ कहती थी :

'आग अपने मायके आई है'
और फिर चूल्हे की लकड़ियाँ

कम कर दी जाती थीं
मैं कहती थी :

'मायके में तो
उसे अच्छे से रहने दो माँ

कम क्यों कर रही हो?'
माँ कहती थी :

'ये लड़की
प्रश्न बहुत पूछती है।'

बाद में समझ आया
प्रश्न पूछने से मना करना

आग कम करने की तरफ़
बढ़ा पहला क़दम होता है।