Pratidin Ek Kavita

चिड़ीमार ने चिड़िया मारी |  केदारनाथ अग्रवाल

हे मेरी तुम!
चिड़ीमार ने चिड़िया मारी;
नन्नी-मुन्नी तड़प गई
प्यारी बेचारी।
हे मेरी तुम!
सहम गई पौधों की सेना,
पाहन-पाथर हुए उदास;
हवा हाय कर
ठिठकी ठहरी;
पीली पड़ी धूप की देही।
हे मेरी तुम!
अब भी वह चिड़िया ज़िंदा है
मेरे भीतर,
नीड़ बनाये मेरे दिल में,
सुबुक-सुबुक कर
चूँ-चूँ करती
चिड़ीमार से डरी-डरी-सी।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

चिड़ीमार ने चिड़िया मारी | केदारनाथ अग्रवाल

हे मेरी तुम!
चिड़ीमार ने चिड़िया मारी;
नन्नी-मुन्नी तड़प गई
प्यारी बेचारी।
हे मेरी तुम!
सहम गई पौधों की सेना,
पाहन-पाथर हुए उदास;
हवा हाय कर
ठिठकी ठहरी;
पीली पड़ी धूप की देही।
हे मेरी तुम!
अब भी वह चिड़िया ज़िंदा है
मेरे भीतर,
नीड़ बनाये मेरे दिल में,
सुबुक-सुबुक कर
चूँ-चूँ करती
चिड़ीमार से डरी-डरी-सी।