Pratidin Ek Kavita

वो ज़माना गुज़र गया कब का । जावेद अख़्तर

वो ज़माना गुज़र गया कब का
था जो दीवाना मर गया कब का

ढूँढता था जो इक नई दुनिया
लूट के अपने घर गया कब का

वो जो लाया था हम को दरिया तक
पार अकेले उतर गया कब का

उस का जो हाल है वही जाने
अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का

ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा
अब कहाँ है बिखर गया कब का

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

वो ज़माना गुज़र गया कब का । जावेद अख़्तर

वो ज़माना गुज़र गया कब का
था जो दीवाना मर गया कब का

ढूँढता था जो इक नई दुनिया
लूट के अपने घर गया कब का

वो जो लाया था हम को दरिया तक
पार अकेले उतर गया कब का

उस का जो हाल है वही जाने
अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का

ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा
अब कहाँ है बिखर गया कब का