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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
शब्द और अर्थ के बीच। गायत्रीबाला पंडा
शब्द और अर्थ के बीच
एक नारी ही बदल जाती है
लंबे इंतज़ार में।
ख़ुद को कोड़ती है
बीज बोती है
अनाज उपजाती है
धरती को सदाबहार बनाती है
और जीवनभर
किसी न किसी की छाया में बैठकर
एक इंसान बनने की
अथक प्रतीक्षा करती है।