Pratidin Ek Kavita

प्रेम और घृणा | नताशा

तुम भेजना प्रेम

बार-बार भेजना
भले ही मैं वापस कर दूँ

लौटेगा प्रेम ही तुम्हारे पास
पर मत भेजना कभी घृणा

घृणा बंद कर देती है दरवाज़े
अँधेरे में क़ैद कर लेती है

हम प्रेम सँजो नहीं पाते
और घृणा पाल बैठते हैं

प्रेम के बदले
न भी लौटा प्रेम

तो लौटेगी
चुप्पी

बेबसी
प्रेम अपरिभाषित ही सही

घृणा
परिभाषा से भी ज़्यादा कट्टर होती है!


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

प्रेम और घृणा | नताशा

तुम भेजना प्रेम

बार-बार भेजना
भले ही मैं वापस कर दूँ

लौटेगा प्रेम ही तुम्हारे पास
पर मत भेजना कभी घृणा

घृणा बंद कर देती है दरवाज़े
अँधेरे में क़ैद कर लेती है

हम प्रेम सँजो नहीं पाते
और घृणा पाल बैठते हैं

प्रेम के बदले
न भी लौटा प्रेम

तो लौटेगी
चुप्पी

बेबसी
प्रेम अपरिभाषित ही सही

घृणा
परिभाषा से भी ज़्यादा कट्टर होती है!