Pratidin Ek Kavita

घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है ।  कुमार दिव्यनशु शेखर
 
कुल जमा चार लोग रहते हैं
छुट्टियों में गिनती कुछ बढ़ जाती है
घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है।

अलग-अलग अँधेरे हिस्सो में 
अपनी ही प्राणवायु के बीच साँय-साँय करते लोग
जोड़ रहे हैं लेखा-जोखा―'अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया!'

एक लड़का है जिसकी दाढ़ी सफेद हो रही है
मरम्मत करता रहता है पहिया वर्तमान का
हर बार जिस पर भूत की कील उभर आती है
धुरी में भविष्य छुपकर बैठ जाता है।

अलग-अलग अँधेरे हिस्सों में
चहारदीवारी के बाहर 
लटके हैं― नरभक्षियों के मुंड
अपहरण करना चाहते हैं धुरी में छुपे भविष्य का।

घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है।
मुझे डर है―
वो लड़का जिसकी दाढ़ी सफेद हो रही है
बन न जाए ब्रह्मराक्षस...

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है । कुमार दिव्यनशु शेखर

कुल जमा चार लोग रहते हैं
छुट्टियों में गिनती कुछ बढ़ जाती है
घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है।

अलग-अलग अँधेरे हिस्सो में
अपनी ही प्राणवायु के बीच साँय-साँय करते लोग
जोड़ रहे हैं लेखा-जोखा―'अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया!'

एक लड़का है जिसकी दाढ़ी सफेद हो रही है
मरम्मत करता रहता है पहिया वर्तमान का
हर बार जिस पर भूत की कील उभर आती है
धुरी में भविष्य छुपकर बैठ जाता है।

अलग-अलग अँधेरे हिस्सों में
चहारदीवारी के बाहर
लटके हैं― नरभक्षियों के मुंड
अपहरण करना चाहते हैं धुरी में छुपे भविष्य का।

घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है।
मुझे डर है―
वो लड़का जिसकी दाढ़ी सफेद हो रही है
बन न जाए ब्रह्मराक्षस...