Pratidin Ek Kavita

धार | अरुण कमल

कौन बचा है जिसके आगे
इन हाथों को नहीं पसारा

यह अनाज जो बदल रक्त में
टहल रहा है तन के कोने-कोने

यह क़मीज़ जो ढाल बनी है
बारिश सर्दी लू में

सब उधार का, माँगा-चाहा
नमक-तेल, हींग-हल्दी तक

सब क़र्ज़े का
यह शरीर भी उनका बंधक

अपना क्या है इस जीवन में
सब तो लिया उधार

सारा लोहा उन लोगों का
अपनी केवल धार


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

धार | अरुण कमल

कौन बचा है जिसके आगे
इन हाथों को नहीं पसारा

यह अनाज जो बदल रक्त में
टहल रहा है तन के कोने-कोने

यह क़मीज़ जो ढाल बनी है
बारिश सर्दी लू में

सब उधार का, माँगा-चाहा
नमक-तेल, हींग-हल्दी तक

सब क़र्ज़े का
यह शरीर भी उनका बंधक

अपना क्या है इस जीवन में
सब तो लिया उधार

सारा लोहा उन लोगों का
अपनी केवल धार