Pratidin Ek Kavita

शाश्वत । दूधनाथ सिंह

यह उदासी जन्म से ही है।

यह सहज, संभाव्य अकुलाहट
मौन में यह दबी घबराहट

यह तुम्हारा अंतरिक्ष-अभाव-तट
कौन जानेगा कि यह जो बादलों में टँका मेरा हठ—

तुम्हारे लिए—यह सच
जन्म से ही है।

और कोई एक भाषा-विपद
और कोई एक कवि-पद

और कोई एक हाहाकार
और कोई तुम—सतत...

कुछ भी हो—
सभी कुछ है बराबर... सभी कुछ है व्यर्थ

सभी कुछ है साधु...
लेकिन यह तुम्हारा अंतरिक्ष-अभाव तट

यह उदासी-भरा हठ—यह
जन्म से ही है।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

शाश्वत । दूधनाथ सिंह

यह उदासी जन्म से ही है।

यह सहज, संभाव्य अकुलाहट
मौन में यह दबी घबराहट

यह तुम्हारा अंतरिक्ष-अभाव-तट
कौन जानेगा कि यह जो बादलों में टँका मेरा हठ—

तुम्हारे लिए—यह सच
जन्म से ही है।

और कोई एक भाषा-विपद
और कोई एक कवि-पद

और कोई एक हाहाकार
और कोई तुम—सतत...

कुछ भी हो—
सभी कुछ है बराबर... सभी कुछ है व्यर्थ

सभी कुछ है साधु...
लेकिन यह तुम्हारा अंतरिक्ष-अभाव तट

यह उदासी-भरा हठ—यह
जन्म से ही है।