Pratidin Ek Kavita

एक अच्छा गाँव । अजेय

एक अच्छे आदमी की तरह

एक अच्छा गाँव भी
एक बहुचर्चित गाँव नहीं होता

अपनी गति से आगे सरकता
अपनी पाठशाला में ककहरा सीखता

अपनी ज़िंदगी के पहाड़े गुनगुनाता
अपनी खड़िया से

अपनी सलेट पट्टी पे
अपने भविष्य की रेखाएँ उकेरता

वह एक गुमनाम क़िस्म का गाँव होता है
अपने कुएँ से पानी पीता

अपनी कुदाली से
अपनी मिट्टी गोड़ता

अपनी फ़सल खाता
अपने जंगल के बियाबानों में पसरा

वह एक गुमसुम क़िस्म का गाँव होता है
अपनी चटाइयों और टोकरियों पर

अपने सपनों की अल्पनाएँ बुनता
अपने आँगन की दुपहरी में

अपनी खटिया पर लेटा
अपनी यादों का हुक्का गुड़गुड़ाता

चुपचाप अपने होने को जायज़ ठहराता
वह एक चुपचाप क़िस्म गाँव होता है

एक अच्छे गाँव से मिलने
चुपचाप जाना पड़ता है

बिना किसी योजना की घोषणा किए
बिना नारा लगाए

बिना मुद्दे उछाले
बिना परचम लहराए

एक अच्छे आदमी की तरह।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

एक अच्छा गाँव । अजेय

एक अच्छे आदमी की तरह

एक अच्छा गाँव भी
एक बहुचर्चित गाँव नहीं होता

अपनी गति से आगे सरकता
अपनी पाठशाला में ककहरा सीखता

अपनी ज़िंदगी के पहाड़े गुनगुनाता
अपनी खड़िया से

अपनी सलेट पट्टी पे
अपने भविष्य की रेखाएँ उकेरता

वह एक गुमनाम क़िस्म का गाँव होता है
अपने कुएँ से पानी पीता

अपनी कुदाली से
अपनी मिट्टी गोड़ता

अपनी फ़सल खाता
अपने जंगल के बियाबानों में पसरा

वह एक गुमसुम क़िस्म का गाँव होता है
अपनी चटाइयों और टोकरियों पर

अपने सपनों की अल्पनाएँ बुनता
अपने आँगन की दुपहरी में

अपनी खटिया पर लेटा
अपनी यादों का हुक्का गुड़गुड़ाता

चुपचाप अपने होने को जायज़ ठहराता
वह एक चुपचाप क़िस्म गाँव होता है

एक अच्छे गाँव से मिलने
चुपचाप जाना पड़ता है

बिना किसी योजना की घोषणा किए
बिना नारा लगाए

बिना मुद्दे उछाले
बिना परचम लहराए

एक अच्छे आदमी की तरह।