Pratidin Ek Kavita

तुम नहीं समझोगे | भवानीप्रसाद मिश्र

तुम नहीं समझोगे केवल किया हुआ

इसलिए अपने किए पर
वाणी फेरता हूँ

और लगता है मुझे
उस पर लगभग पानी फेरता हूँ

तब भी नहीं समझते तुम
तो मैं उलझ जाता हूँ

लगता है जैसे
नाहक़ अरण्य में गाता हूँ

और चुप हो जाता हूँ फिर
लजाकर

अपनी वाणी को
इस तरह स्वर से सजा कर!


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

तुम नहीं समझोगे | भवानीप्रसाद मिश्र

तुम नहीं समझोगे केवल किया हुआ

इसलिए अपने किए पर
वाणी फेरता हूँ

और लगता है मुझे
उस पर लगभग पानी फेरता हूँ

तब भी नहीं समझते तुम
तो मैं उलझ जाता हूँ

लगता है जैसे
नाहक़ अरण्य में गाता हूँ

और चुप हो जाता हूँ फिर
लजाकर

अपनी वाणी को
इस तरह स्वर से सजा कर!