Pratidin Ek Kavita

आज़ादी अभी अधूरी है-

सच है यह बात समझ प्यारे।
कुछ सुविधाओं के टुकड़े खा-
मत नौ-नौ बाँस उछल प्यारे।
गोरे गैरों का जुल्म था कल
अब सितम हमारे अपनों का
ये कुछ भी कहें, पर देश
बना नहीं भीमराव के सपनों का।
एक डाल ही क्यों? एक फूल ही क्‍यों?
सारा उद्यान बदल प्यारे।
आज़ादी अभी अधूरी है।
सच है ये बात समझ प्यारे।
है जिसका लहू मयखाने में
वो वसर आज तसना-लव है
कुत्तों की हालत बदली है
दलितों की ज़िन्दगी बदतर है।
कर हकों की ठंडी बात नहीं
बदलाव की आग उगल प्यारे
आज़ादी अभी अधूरी है।

सच है ये बात समझ प्यारे।

यह सोच कुँवारी बहन है क्‍यों?
माँ-बाप का दिल बेचैन है क्‍यों?
पढ़-लिख के मिली बेकारी क्‍यों?
मेहनत का फल बेज़ारी क्‍यों?
तू मेरे ग़म की बात न कर
अपना तो दर्द समझ प्यारे ।
आज़ादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यारे।
नेता, तस्कर धनवान हैं क्‍यों?
हम दलितों का अपमान है क्‍यों?
भूखे-नंगे भिखमंगों से
भर रहा ये हिन्दुस्तान है क्‍यों?
शोषक जाति और धर्मों
के भी बने देश में दल प्यारे।
आज़ादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यारे।
तू वर्दी के व्यभिचार देख
खादी की कोठी-कार देख
पहले पॉकेट का भार देख
फिर रिश्तों का बाज़ार देख
रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा-
का कुछ प्रबन्ध तो कर प्यारे।
आज़ादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यारे।
हाँ, पूँजीवादी दानव से
खतरे में है शोषित मानवता
गूँगे-बहरों से क्या कहिए?
अटकी है गले में व्यथा-कथा।
पत्थर दिल पर, कोई असर नहीं
में तिल-तिल रहा पिचल प्यारे ।
आज़ादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यारे।
जिनके हाथों से महल बने
वे खुली सड़क पर लोग पड़े
तन पर कपड़े का तार नहीं
बुन-बुन कर के भंडार भरे
खूँखार भेड़िया-सा दिल में
सरमायेदारों का है डर प्यारे।
आज़ादी अभी अधूरी है
सच है यह बात समझ प्यारे।
“बन्दी” बेगुनाह, बरी खूनी
क्या यह सारा कुछ कानूनी ?
मजदूरों की दुनिया सूनी
बढ़ रही मुसीबत दिन दूनी
पट॒टे दलितों के नाम
खेत में गेर दलित का हल प्यारे।
आजादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यारे।
निज देश की कंचन काया में
यह वर्ण-विषमता कोढ़ हुआ।
कहीं शोषक, शासक बन बैठा
कहीं दोनों में गठजोड़ हुआ।
क्या लोकतनन्‍्त्र? कल के राजे-
गये मन्त्री बन, सज-धज प्यारे?
आज़ादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यारे।
भूखों की भूख मिटा न सका
शोषण और लूट बचा न सको।
जिस सुबह की ख़ातिर दलित मर
वो सुबह अभी तक आ न सका
दख-सख समान किस तरह वैंट
यह यक्ति सोच पल छिन प्यार।
आजादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यार।
मजबूत हैं हम, कमजार जोर नहीं ।
अपना निर्माता और नहीं
मिल बैठें लें तकदीर बदल
दनिया भर की तस्वीर बदल
मत अवतारों की राह देख
कर स्वयं समस्या हल प्यारे।
कुछ सुविधाओं के टुकड़े खा
मत नौ-नौ बॉस उछल प्यारे।
आजादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यारे ।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

आज़ादी अभी अधूरी है-

सच है यह बात समझ प्यारे।
कुछ सुविधाओं के टुकड़े खा-
मत नौ-नौ बाँस उछल प्यारे।
गोरे गैरों का जुल्म था कल
अब सितम हमारे अपनों का
ये कुछ भी कहें, पर देश
बना नहीं भीमराव के सपनों का।
एक डाल ही क्यों? एक फूल ही क्‍यों?
सारा उद्यान बदल प्यारे।
आज़ादी अभी अधूरी है।
सच है ये बात समझ प्यारे।
है जिसका लहू मयखाने में
वो वसर आज तसना-लव है
कुत्तों की हालत बदली है
दलितों की ज़िन्दगी बदतर है।
कर हकों की ठंडी बात नहीं
बदलाव की आग उगल प्यारे
आज़ादी अभी अधूरी है।

सच है ये बात समझ प्यारे।

यह सोच कुँवारी बहन है क्‍यों?
माँ-बाप का दिल बेचैन है क्‍यों?
पढ़-लिख के मिली बेकारी क्‍यों?
मेहनत का फल बेज़ारी क्‍यों?
तू मेरे ग़म की बात न कर
अपना तो दर्द समझ प्यारे ।
आज़ादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यारे।
नेता, तस्कर धनवान हैं क्‍यों?
हम दलितों का अपमान है क्‍यों?
भूखे-नंगे भिखमंगों से
भर रहा ये हिन्दुस्तान है क्‍यों?
शोषक जाति और धर्मों
के भी बने देश में दल प्यारे।
आज़ादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यारे।
तू वर्दी के व्यभिचार देख
खादी की कोठी-कार देख
पहले पॉकेट का भार देख
फिर रिश्तों का बाज़ार देख
रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा-
का कुछ प्रबन्ध तो कर प्यारे।
आज़ादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यारे।
हाँ, पूँजीवादी दानव से
खतरे में है शोषित मानवता
गूँगे-बहरों से क्या कहिए?
अटकी है गले में व्यथा-कथा।
पत्थर दिल पर, कोई असर नहीं
में तिल-तिल रहा पिचल प्यारे ।
आज़ादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यारे।
जिनके हाथों से महल बने
वे खुली सड़क पर लोग पड़े
तन पर कपड़े का तार नहीं
बुन-बुन कर के भंडार भरे
खूँखार भेड़िया-सा दिल में
सरमायेदारों का है डर प्यारे।
आज़ादी अभी अधूरी है
सच है यह बात समझ प्यारे।
“बन्दी” बेगुनाह, बरी खूनी
क्या यह सारा कुछ कानूनी ?
मजदूरों की दुनिया सूनी
बढ़ रही मुसीबत दिन दूनी
पट॒टे दलितों के नाम
खेत में गेर दलित का हल प्यारे।
आजादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यारे।
निज देश की कंचन काया में
यह वर्ण-विषमता कोढ़ हुआ।
कहीं शोषक, शासक बन बैठा
कहीं दोनों में गठजोड़ हुआ।
क्या लोकतनन्‍्त्र? कल के राजे-
गये मन्त्री बन, सज-धज प्यारे?
आज़ादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यारे।
भूखों की भूख मिटा न सका
शोषण और लूट बचा न सको।
जिस सुबह की ख़ातिर दलित मर
वो सुबह अभी तक आ न सका
दख-सख समान किस तरह वैंट
यह यक्ति सोच पल छिन प्यार।
आजादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यार।
मजबूत हैं हम, कमजार जोर नहीं ।
अपना निर्माता और नहीं
मिल बैठें लें तकदीर बदल
दनिया भर की तस्वीर बदल
मत अवतारों की राह देख
कर स्वयं समस्या हल प्यारे।
कुछ सुविधाओं के टुकड़े खा
मत नौ-नौ बॉस उछल प्यारे।
आजादी अभी अधूरी है।
सच है यह बात समझ प्यारे ।