Pratidin Ek Kavita

मुस्टंडा और बच्चा।  शुभा

भाषा के अंदर बहुत सी बातें
सबने मिलकर बनाई होती हैं

इसलिए भाषा बहुत समय
एक विश्वास की तरह चलती है

जैसे हम अगर कहें बच्चा
तो सभी समझते हैं, हाँ बच्चा

लेकिन बच्चे की जगह बैठा होता है
एक परजीवी

एक तानाशाह
फिर भी हम कहते रहते हैं—

बच्चा! ओहो बच्चा!
और पूरा देश मुस्टंडों से भर जाता है

किसी उजड़े हुए बूढ़े में
किसी ठगी गई औरत में

किसी गूँगे में जैसे किसी स्मृति में
छिपकर जान बचाता है बच्चा

अब मुस्टंडा भी है और बच्चा भी है
इन्हें अलग-अलग पहचानने वाला भी है

भाषा अब भी है विश्वास की तरह अकारथ


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

मुस्टंडा और बच्चा। शुभा

भाषा के अंदर बहुत सी बातें
सबने मिलकर बनाई होती हैं

इसलिए भाषा बहुत समय
एक विश्वास की तरह चलती है

जैसे हम अगर कहें बच्चा
तो सभी समझते हैं, हाँ बच्चा

लेकिन बच्चे की जगह बैठा होता है
एक परजीवी

एक तानाशाह
फिर भी हम कहते रहते हैं—

बच्चा! ओहो बच्चा!
और पूरा देश मुस्टंडों से भर जाता है

किसी उजड़े हुए बूढ़े में
किसी ठगी गई औरत में

किसी गूँगे में जैसे किसी स्मृति में
छिपकर जान बचाता है बच्चा

अब मुस्टंडा भी है और बच्चा भी है
इन्हें अलग-अलग पहचानने वाला भी है

भाषा अब भी है विश्वास की तरह अकारथ