Pratidin Ek Kavita

बागी बियाबान औरतें।  ऐश्वर्या तिवारी
 
लोग कहते हैं
वो औरत है ही कहाँ,
ज़्यादा  सही शब्द है
आफ़त।
उसके गले में कोई मंगलसूत्र नहीं,
एक सूखी नदी लटकी है
जिस पर कभी किसी ने नाव चलाने की ज़िद की थी
और आधे में ही डर गया।
वो हँसती है तो लगता है
जैसे किसी पुराने मकान की दीवार
अचानक गिर पडी हो -
लोग भागते हैं मलबा बचाने,
वो बस अपनी हँसी से धूल झाड़ती है।
उसकी देह पर कपड़े कम हैं,
किस्से ज़्यादा।
हर तह से कोई मर्द निकलता है
जो कभी उसे देवी बुलाता था,
कभी डायन,
और कभी 'दोस्त',
और हर नाम के साथ

उसके भीतर की मिट्टी और पत्थर
थोड़े-थोड़े हमेशा बदलते रहे हैं।
वो बियाबान है
क्योंकि उसने अपने भीतर की
 हरी घास खुद उखाड़कर फेंक दी थी। 
जिस दिन उसे समझ आया
कि लोग उसकी खूबसूरती पर नहीं,
उसकी "कमीज़ की आख़िरी बटन" पर
कविताएं लिखते हैं।
उस रात उसने अपने सीने पर हाथ रखकर कहा था
"ये दिल नहीं, अदालत है,
और आज से सिर्फ यहाँ एक ही मुकदमा चलेगा
ख़ुद बनाम दुनिया।"

वो चाय बनाते हुए भी
इंक़लाब सोचती है,
लोटे में पानी भरते हुए
आज़ादी मापती है,
और जब दुपट्टा झाड़ती है
तो जैसे सदियों की धूल
आसमान पर फेंक देती है
कोई तारा कम भी हो जाए,
तो उसे कोई परवाह नहीं।
उसकी चाल में बाज़ार की चालाकी नहीं,
कब्रिस्तान जैसी सच्चाई है -
शांत, साफ़, अन्तिम।
वो किसी की अमानत नहीं,
ना बाप की इज्ज़त,
ना पति की नाक,
ना प्रेमी का राज़

वो अपने ही गुनाहों की
इकलौती वारिस है -
गिनती भी खुद रखती है,
और माफ़ी भी खुद दे देती है।
लोग उसे "बागी" बुलाते हैं 
क्योंकि वो "हाँ से पहले
"क्यों' पूछ लेती है,
"कब लौटोगे?" से पहले
"क्यों रहूं" सोच लेती है।
वो बियाबान है
पर सूखा नहीं।
उसके भीतर किसी पुराने मेहबूब की
भूली हुई ख़ुशबू बसी हुई है 
कभी-कभी रात में
वो खुद से पूछती है -
"अगर मैं इतनी ही बुरी हूँ 
तो मेरी आँख  में पानी का एक कतरा

अब भी क्यों बाकी है?"
कोई जवाब नहीं देता।
बस उसकी परछाई
दीवार से उतरकर
उसके साथ बैठ जाती है।
दोनों मिलकर सिगरेट सुलगाती हैं,
एक ही धुए को भीतर खींचती हैं
फ़र्क़ बस इतना है,
कि एक की आँख  में आँसू हैं,
और दुसरे की आँख में आग।
सुबह होते-होते
आग और आँसू
एक ही नमी में बदल जाते हैं।
और वो औरत,

जो शहर की नज़रों में
"बागी बियाबान" है,
अपने भीतर से
चुपचाप एक नन्हा सा बीज उठाती है,
ज़मीन में नहीं,
ज़ुबान पर बो देती है
ताकि अगली बार
जब वो बोले,
कोई फूल नहीं,
सीधा जंगल उगे।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

बागी बियाबान औरतें। ऐश्वर्या तिवारी

लोग कहते हैं
वो औरत है ही कहाँ,
ज़्यादा सही शब्द है
आफ़त।
उसके गले में कोई मंगलसूत्र नहीं,
एक सूखी नदी लटकी है
जिस पर कभी किसी ने नाव चलाने की ज़िद की थी
और आधे में ही डर गया।
वो हँसती है तो लगता है
जैसे किसी पुराने मकान की दीवार
अचानक गिर पडी हो -
लोग भागते हैं मलबा बचाने,
वो बस अपनी हँसी से धूल झाड़ती है।
उसकी देह पर कपड़े कम हैं,
किस्से ज़्यादा।
हर तह से कोई मर्द निकलता है
जो कभी उसे देवी बुलाता था,
कभी डायन,
और कभी 'दोस्त',
और हर नाम के साथ

उसके भीतर की मिट्टी और पत्थर
थोड़े-थोड़े हमेशा बदलते रहे हैं।
वो बियाबान है
क्योंकि उसने अपने भीतर की
हरी घास खुद उखाड़कर फेंक दी थी।
जिस दिन उसे समझ आया
कि लोग उसकी खूबसूरती पर नहीं,
उसकी "कमीज़ की आख़िरी बटन" पर
कविताएं लिखते हैं।
उस रात उसने अपने सीने पर हाथ रखकर कहा था
"ये दिल नहीं, अदालत है,
और आज से सिर्फ यहाँ एक ही मुकदमा चलेगा
ख़ुद बनाम दुनिया।"

वो चाय बनाते हुए भी
इंक़लाब सोचती है,
लोटे में पानी भरते हुए
आज़ादी मापती है,
और जब दुपट्टा झाड़ती है
तो जैसे सदियों की धूल
आसमान पर फेंक देती है
कोई तारा कम भी हो जाए,
तो उसे कोई परवाह नहीं।
उसकी चाल में बाज़ार की चालाकी नहीं,
कब्रिस्तान जैसी सच्चाई है -
शांत, साफ़, अन्तिम।
वो किसी की अमानत नहीं,
ना बाप की इज्ज़त,
ना पति की नाक,
ना प्रेमी का राज़

वो अपने ही गुनाहों की
इकलौती वारिस है -
गिनती भी खुद रखती है,
और माफ़ी भी खुद दे देती है।
लोग उसे "बागी" बुलाते हैं
क्योंकि वो "हाँ से पहले
"क्यों' पूछ लेती है,
"कब लौटोगे?" से पहले
"क्यों रहूं" सोच लेती है।
वो बियाबान है
पर सूखा नहीं।
उसके भीतर किसी पुराने मेहबूब की
भूली हुई ख़ुशबू बसी हुई है
कभी-कभी रात में
वो खुद से पूछती है -
"अगर मैं इतनी ही बुरी हूँ
तो मेरी आँख में पानी का एक कतरा

अब भी क्यों बाकी है?"
कोई जवाब नहीं देता।
बस उसकी परछाई
दीवार से उतरकर
उसके साथ बैठ जाती है।
दोनों मिलकर सिगरेट सुलगाती हैं,
एक ही धुए को भीतर खींचती हैं
फ़र्क़ बस इतना है,
कि एक की आँख में आँसू हैं,
और दुसरे की आँख में आग।
सुबह होते-होते
आग और आँसू
एक ही नमी में बदल जाते हैं।
और वो औरत,

जो शहर की नज़रों में
"बागी बियाबान" है,
अपने भीतर से
चुपचाप एक नन्हा सा बीज उठाती है,
ज़मीन में नहीं,
ज़ुबान पर बो देती है
ताकि अगली बार
जब वो बोले,
कोई फूल नहीं,
सीधा जंगल उगे।