Pratidin Ek Kavita

मैं नीर भरी | महादेवी वर्मा

मैं नीर भरी दु:ख की बदली!
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा;

क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक-से जलते

पलकों में निर्झरिणी मचली!
मेरा पग-पग संगीत-भरा,

श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,
नभ के नव रँग बुनते दुकूल,

छाया में मलय-बयार पली!
मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल,

चिंता का भार, बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी

नवजीवन-अंकुर बन निकली!
पथ को न मलिन करता आना,

पद-चिह्न न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में

सुख की सिहरन हो अंत खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना;

मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही

उमड़ी कल थी मिट आज चली!
मैं नीर भरी दु:ख की बदली!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

मैं नीर भरी | महादेवी वर्मा

मैं नीर भरी दु:ख की बदली!
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा;

क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक-से जलते

पलकों में निर्झरिणी मचली!
मेरा पग-पग संगीत-भरा,

श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,
नभ के नव रँग बुनते दुकूल,

छाया में मलय-बयार पली!
मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल,

चिंता का भार, बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी

नवजीवन-अंकुर बन निकली!
पथ को न मलिन करता आना,

पद-चिह्न न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में

सुख की सिहरन हो अंत खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना;

मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही

उमड़ी कल थी मिट आज चली!
मैं नीर भरी दु:ख की बदली!