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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
डिप्रेशन | मोहम्मद अल्वी
कोई हादसा
कोई सानेहा*
कोई बहुत ही बुरी ख़बर
अभी कहीं से आएगी!
ऐसी जाँ-लेवा फ़िक्रों में
सारा दिन डूबा रहता हूँ
रात को सोने से पहले
अपने-आप से कहता हूँ
भाई मिरे
दिन ख़ैर से गुज़रा
घर में सब आराम से हैं
कल की फ़िक्रें
कल के लिए उठा रक्खो
मुमकिन हो तो
अपने-आप को
मौत की नींद सुला रक्खो!!
*अप्रिय घटना