Pratidin Ek Kavita

पहाड़ी बच्चा ।  निर्मला पुतुल 

पहाड़ की गोद में 
 पहाड़ के छोटे-छोटे टुकड़ों सा
खेलता है पहाड़ी बच्चा  
लड़खड़ाते  कदमों से पहाड़ चढ़ते 
रोपता है पहाड़ी धरती पर पाँव 
पहाड़ी माहौल में पहाड़ की तरह 
पूरी ताकत से होने के लिए 
पहाड़ी बच्चों के भीतर होता है 
पूरा का पूरा पहाड़,
और पहाड़ों की गोद में होता है  
दौड़ता, भागता पहाड़ी बच्चा,
पहाड़ी बच्चा देखता है 
पहाड़ के ऊपर से गुज़रता जहाज़ 
और पूछता है पिता से
उस नए पक्षी के बारे में 
उस नए पक्षी के बारे में 
उस नए पक्षी के बारे में। 


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

पहाड़ी बच्चा । निर्मला पुतुल

पहाड़ की गोद में
पहाड़ के छोटे-छोटे टुकड़ों सा
खेलता है पहाड़ी बच्चा
लड़खड़ाते कदमों से पहाड़ चढ़ते
रोपता है पहाड़ी धरती पर पाँव
पहाड़ी माहौल में पहाड़ की तरह
पूरी ताकत से होने के लिए
पहाड़ी बच्चों के भीतर होता है
पूरा का पूरा पहाड़,
और पहाड़ों की गोद में होता है
दौड़ता, भागता पहाड़ी बच्चा,
पहाड़ी बच्चा देखता है
पहाड़ के ऊपर से गुज़रता जहाज़
और पूछता है पिता से
उस नए पक्षी के बारे में
उस नए पक्षी के बारे में
उस नए पक्षी के बारे में।