Pratidin Ek Kavita

देना | नवीन सागर

जिसने मेरा घर जलाया

उसे इतना बड़ा घर
देना कि बाहर निकलने को चले

पर निकल न पाए
जिसने मुझे मारा

उसे सब देना
मृत्यु न देना

जिसने मेरी रोटी छीनी
उसे रोटियों के समुद्र में फेंकना

और तूफ़ान उठाना
जिनसे मैं नहीं मिला

उनसे मिलवाना
मुझे इतनी दूर छोड़ आना

कि बराबर संसार में आता रहूँ
अगली बार

इतना प्रेम देना
कि कह सकूँ प्रेम करता हूँ

और वह मेरे सामने हो।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

देना | नवीन सागर

जिसने मेरा घर जलाया

उसे इतना बड़ा घर
देना कि बाहर निकलने को चले

पर निकल न पाए
जिसने मुझे मारा

उसे सब देना
मृत्यु न देना

जिसने मेरी रोटी छीनी
उसे रोटियों के समुद्र में फेंकना

और तूफ़ान उठाना
जिनसे मैं नहीं मिला

उनसे मिलवाना
मुझे इतनी दूर छोड़ आना

कि बराबर संसार में आता रहूँ
अगली बार

इतना प्रेम देना
कि कह सकूँ प्रेम करता हूँ

और वह मेरे सामने हो।