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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
कहाँ रहेगी वह संताप के साथ?/ गगन गिल
अगर वह उसके सीने पर
रख दे अपना सिर
या उसके कंधे पर
अगर वह छुए उसका हाथ
अक्तूबर की झुरझुरी में
थाम ले उसकी बाँह घबराकर
स्टेशन की हड़बड़ी में
लौटते हुए रख दे चुपचाप
उसकी गर्म गर्दन पर
अलविदा का एक अधूरा, रुआँसा चुम्बन
तो
उस लम्बी-चौड़ी देह में
क्या इतनी जगह होगी
जहाँ वह रह सके
अपने सारे संताप के साथ?