Pratidin Ek Kavita

इच्छाएँ । आस्तीक वाजपेयी

लकड़ी की अलमारी पर धूल,
उनसे चिपकी दीवार पर टँगी इच्छाएँ।

जैसे मैं अलमारी को,
वैसे पूरी न हुई इच्छाएँ मुझे,

झाड़ने आती हैं।




What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

इच्छाएँ । आस्तीक वाजपेयी

लकड़ी की अलमारी पर धूल,
उनसे चिपकी दीवार पर टँगी इच्छाएँ।

जैसे मैं अलमारी को,
वैसे पूरी न हुई इच्छाएँ मुझे,

झाड़ने आती हैं।