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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
मुझ को तेरा शबाब ले बैठा। शिव कुमार बटालवी
अनुवाद: आकाश 'अर्श'
मुझ को तेरा शबाब ले बैठा
रंग, गोरा गुलाब ले बैठा
दिल का डर था कहीं न ले बैठे
ले ही बैठा जनाब ले बैठा
जब भी फ़ुर्सत मिली है फ़र्ज़ों से
तेरे रुख़ की किताब ले बैठा
कितनी बीती है कितनी बाक़ी है
मुझ को इस का हिसाब ले बैठा
मुझ को जब भी है तेरी याद आई
दिन-दहाड़े शराब ले बैठा
अच्छा होता सवाल ना करता
मुझ को तेरा जवाब ले बैठा
'शिव' को इक ग़म पे ही भरोसा था
ग़म से कोरा जवाब ले बैठा