Pratidin Ek Kavita

रात का पेड़ | राही मासूम रज़ा

रास्ते

चाँदनी ओढ़ कर सो गए
झील पर नींद की सिलवटें पड़ गईं

आहटें
पहले पीली पड़ीं

और फिर
एक-एक करके सब झड़ गईं

रात का पेड़
दस्ते-दुआ बन गया

अपनी ही ज़ात से
अपने ही आपके बीच का फ़ासिला बन गया

दर्द का रास्ता बन गया
एक बूढ़ा

पुर-असरार दरवेश
जो सैकड़ों हाथ अपने उठाए हुए

आसमाँ की तरफ़
देखते-देखते थक गया

आसमाँ चुप रहा
रात के पेड़ के हाथ दुखने लगे

फिर वही पेड़
वहशत का इक सिलसिला बन गया

क़िस्सा-ए-अहले-दिल
क़िस्सा-ए-साहिबाने-वफ़ा बन गया

ज़ख़्मों की कोंपलें आ गईं
और उस पेड़ ने झुक के मुझसे कहा :

“सुबह के शौक़ में जागने से बड़ी कोई नेमत नहीं
अपनी आँखों को तुम

सुबह के शौक़ में
जागने और जगाने की तालीम दो”


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

रात का पेड़ | राही मासूम रज़ा

रास्ते

चाँदनी ओढ़ कर सो गए
झील पर नींद की सिलवटें पड़ गईं

आहटें
पहले पीली पड़ीं

और फिर
एक-एक करके सब झड़ गईं

रात का पेड़
दस्ते-दुआ बन गया

अपनी ही ज़ात से
अपने ही आपके बीच का फ़ासिला बन गया

दर्द का रास्ता बन गया
एक बूढ़ा

पुर-असरार दरवेश
जो सैकड़ों हाथ अपने उठाए हुए

आसमाँ की तरफ़
देखते-देखते थक गया

आसमाँ चुप रहा
रात के पेड़ के हाथ दुखने लगे

फिर वही पेड़
वहशत का इक सिलसिला बन गया

क़िस्सा-ए-अहले-दिल
क़िस्सा-ए-साहिबाने-वफ़ा बन गया

ज़ख़्मों की कोंपलें आ गईं
और उस पेड़ ने झुक के मुझसे कहा :

“सुबह के शौक़ में जागने से बड़ी कोई नेमत नहीं
अपनी आँखों को तुम

सुबह के शौक़ में
जागने और जगाने की तालीम दो”