Pratidin Ek Kavita

कई आँखों की हैरत थे नहीं हैं | अक्स समस्तीपुरी 

कई आँखों की हैरत थे नहीं हैं
नये मंज़र की सूरत थे नहीं हैं

बिछड़ने पर तमाशा क्यों बनाएँ
तुम्हारी हम ज़रूरत थे नहीं हैं

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

कई आँखों की हैरत थे नहीं हैं | अक्स समस्तीपुरी

कई आँखों की हैरत थे नहीं हैं
नये मंज़र की सूरत थे नहीं हैं

बिछड़ने पर तमाशा क्यों बनाएँ
तुम्हारी हम ज़रूरत थे नहीं हैं