Pratidin Ek Kavita

हँसो एक बच्चे की तरह | अमिता प्रजापति

तुम प्यार को पृथ्वी
मान कर
मत घूमो हर्क्यूलिस की तरह
मत झुकाओ इसके वज़न से
अपनी गर्दन
धीरे से सरका के इसे
गिरा लो अपने पैरों में
उछालो गेंद की तरह
हँसो एक बच्चे की तरह...

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

तुम प्यार को पृथ्वी
मान कर
मत घूमो हर्क्यूलिस की तरह
मत झुकाओ इसके वज़न से
अपनी गर्दन
धीरे से सरका के इसे
गिरा लो अपने पैरों में
उछालो गेंद की तरह
हँसो एक बच्चे की तरह...