Pratidin Ek Kavita

तेरे सपने में थोड़े हूँ | तेजी ग्रोवर

तेरे सपने में थोड़े हूँ पगली
मैं तो बैठा हूँ

टाट पर
सजूगर

अचार भरी उँगलियाँ चाटता हुआ
मैं टाट पर थोड़े हूँ पगली

झूलती खाट में
सो रहा हूँ तेरे पास

इतना पास
कि तेरा पेट गुड़गुड़ाया

तो मैंने सोचा मेरा है
भोर तक यहीं हूँ पगली

तू साँस छोड़ेगी
तो भींज उठेंगी मेरी कोंपलें

मेरी खुरदरी उँगलियाँ
नींद की रोई तेरी आँखों पर

काँप-काँप जाएँगी
और तू

झपकी भर नहीं जगेगी रात में
मैं जा रहा हूँ पगली

तेरे खुलने से पहले
उजास में घुल रही है मेरी आँख

छूना मटका तो मान लेना
मैं आया था

घोर अँधेरे तपते तीर की तरह आया था
रात भर प्यासा रहा।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

तेरे सपने में थोड़े हूँ | तेजी ग्रोवर

तेरे सपने में थोड़े हूँ पगली
मैं तो बैठा हूँ

टाट पर
सजूगर

अचार भरी उँगलियाँ चाटता हुआ
मैं टाट पर थोड़े हूँ पगली

झूलती खाट में
सो रहा हूँ तेरे पास

इतना पास
कि तेरा पेट गुड़गुड़ाया

तो मैंने सोचा मेरा है
भोर तक यहीं हूँ पगली

तू साँस छोड़ेगी
तो भींज उठेंगी मेरी कोंपलें

मेरी खुरदरी उँगलियाँ
नींद की रोई तेरी आँखों पर

काँप-काँप जाएँगी
और तू

झपकी भर नहीं जगेगी रात में
मैं जा रहा हूँ पगली

तेरे खुलने से पहले
उजास में घुल रही है मेरी आँख

छूना मटका तो मान लेना
मैं आया था

घोर अँधेरे तपते तीर की तरह आया था
रात भर प्यासा रहा।