Pratidin Ek Kavita

तुम्हें डर है | गोरख पांडेय

हज़ार साल पुराना है उनका ग़ुस्सा

हज़ार साल पुरानी है उनकी नफ़रत
मैं तो सिर्फ़

उनके बिखरे हुए शब्दों को
लय और तुक के साथ

लौटा रहा हूँ
मगर तुम्हें डर है कि

आग भड़का रहा हूँ।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

तुम्हें डर है | गोरख पांडेय

हज़ार साल पुराना है उनका ग़ुस्सा

हज़ार साल पुरानी है उनकी नफ़रत
मैं तो सिर्फ़

उनके बिखरे हुए शब्दों को
लय और तुक के साथ

लौटा रहा हूँ
मगर तुम्हें डर है कि

आग भड़का रहा हूँ।