Pratidin Ek Kavita

हवा जब आएगी | चंपा वैद 

हवा जल आएगी अकेली
बैठा लूँगी अपने पास
चले चलेंगे हम दोनों
उस कविता के पर्वत पर
उड़ते, पेड़ लगाते, एक हज़ार
चश्मों से एकत्रित कर जल
और सूरज के प्रबल प्रकाश
मैं भी धूप बटोरूँगी दिन भर
हवा तुम्हारे साथ

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

हवा जब आएगी | चंपा वैद

हवा जल आएगी अकेली
बैठा लूँगी अपने पास
चले चलेंगे हम दोनों
उस कविता के पर्वत पर
उड़ते, पेड़ लगाते, एक हज़ार
चश्मों से एकत्रित कर जल
और सूरज के प्रबल प्रकाश
मैं भी धूप बटोरूँगी दिन भर
हवा तुम्हारे साथ