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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
अलगनी | शहंशाह आलम
अलगनी पर मैंने क्या चीज़ सुखाई
कविता की वो गीली किताबें
जिसे बारिश ने पढ़ा था पूरे मन से
जो बारिश मेघालय में होती होगी
वही बारिश हुई इस दफ़ा मेरे पटना में
अलगनी पर मैंने और क्या चीज़ सुखाई
कविता की किताबों के अलावा
अपने कपड़े… नहीं न
अपने जूते… नहीं न
अपने मोजे… नहीं न
अपना पूरा घर सुखाया
धूप के निकलने पर
और अपनी देह को भी
टाँगकर रखा अलगनी पर
अब जब बारिश के बाद ठंड आएगी
दस्तक देगी अलगनी ही मेरे दरवाज़े पर।