Pratidin Ek Kavita

घ र । अरुण कुमार सिंह 

घर की याद में
घर का स्पर्श है
शब्दशः घ र
बुदबुदाते हुए
शरीर का स्पर्श करता हूँ
रेखाएं खोजती रहती हैं
रास्ता घर का
रेखाएं अंधी हैं
घर नहीं दिखता
आजकल बहुत चलता हूँ
खड़ा रहता हूँ
दूर तक देखता हूँ 

सबके सामने कपड़ों के भीतर
नहीं टटोल पाता
कायर शब्द गले में मिलता है
उबकी आते ही किराए के कमरे में भागता हूँ
चुपके से ढूंढता हूँ 
र 
के बीच का हिस्सा

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

घ र । अरुण कुमार सिंह

घर की याद में
घर का स्पर्श है
शब्दशः घ र




बुदबुदाते हुए
शरीर का स्पर्श करता हूँ
रेखाएं खोजती रहती हैं
रास्ता घर का
रेखाएं अंधी हैं
घर नहीं दिखता
आजकल बहुत चलता हूँ
खड़ा रहता हूँ
दूर तक देखता हूँ



सबके सामने कपड़ों के भीतर


नहीं टटोल पाता
कायर शब्द गले में मिलता है
उबकी आते ही किराए के कमरे में भागता हूँ
चुपके से ढूंढता हूँ


के बीच का हिस्सा