Pratidin Ek Kavita

नावें | नरेश सक्सेना 

नावों ने खिलाए हैं फूल मटमैले
क्या उन्हें याद है कि वे कभी पेड़ बनकर उगी थीं 
नावें पार उतारती हैं
ख़ुद नहीं उतरतीं पार
नावें धार के बीचों-बीच  रहना चाहती हैं
तैरने न दे उस उथलेपन को समझती हैं ठीक-ठीक
लेकिन तैरने लायक गहराई से ज़्यादा के बारे में
कुछ भी नहीं जानतीं नावें
बाढ़ उतरने के बाद वे अकसर मिलती हैं
छतों या पेड़ों पर चढ़ी हुईं 
नावें डूबने से डरती हैं
भर-भर कर खाली होती रहती हैं नावें
सुनसान तटों पर चुपचाप
खूँटों से बँधी रहती हैं नावें।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

नावें | नरेश सक्सेना

नावों ने खिलाए हैं फूल मटमैले
क्या उन्हें याद है कि वे कभी पेड़ बनकर उगी थीं
नावें पार उतारती हैं
ख़ुद नहीं उतरतीं पार
नावें धार के बीचों-बीच रहना चाहती हैं
तैरने न दे उस उथलेपन को समझती हैं ठीक-ठीक
लेकिन तैरने लायक गहराई से ज़्यादा के बारे में
कुछ भी नहीं जानतीं नावें
बाढ़ उतरने के बाद वे अकसर मिलती हैं
छतों या पेड़ों पर चढ़ी हुईं
नावें डूबने से डरती हैं
भर-भर कर खाली होती रहती हैं नावें
सुनसान तटों पर चुपचाप
खूँटों से बँधी रहती हैं नावें।