Pratidin Ek Kavita

हम अधरों-अधरों बिखरेंगे | सीमा अग्रवाल 

तुम पन्नों पर सजे रहो
हम अधरों-अधरों
बिखरेंगे

तुम बन ठन कर
घर में बैठो
हम सड़कों से बात करें

तुम मुट्ठी में
कसे रहो हम
पोर पोर खैरात करें

इतराओ गुलदानों में तुम
हम मिट्टी में
निखरेंगे

कलफ लगे कपडे
सी अकड़ी
गर्दन के तुम हो स्वामी

दायें बाए आगे पीछे
हर दिक् के
हम सहगामी

हठयोगी से
सधे रहो तुम
हम हर दिल से गुज़रेंगे 

तुम अनुशासित
झीलों जैसे
हल्का हल्का मुस्काते

हम अल्हड़ नदियों
सा हँसते
हर पत्थर से बतियाते

तुम चिंतन के
शिखर चढ़ो
हम चिंताओं में उतरेंगे

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

हम अधरों-अधरों बिखरेंगे | सीमा अग्रवाल

तुम पन्नों पर सजे रहो
हम अधरों-अधरों
बिखरेंगे

तुम बन ठन कर
घर में बैठो
हम सड़कों से बात करें

तुम मुट्ठी में
कसे रहो हम
पोर पोर खैरात करें

इतराओ गुलदानों में तुम
हम मिट्टी में
निखरेंगे

कलफ लगे कपडे
सी अकड़ी
गर्दन के तुम हो स्वामी

दायें बाए आगे पीछे
हर दिक् के
हम सहगामी

हठयोगी से
सधे रहो तुम
हम हर दिल से गुज़रेंगे

तुम अनुशासित
झीलों जैसे
हल्का हल्का मुस्काते

हम अल्हड़ नदियों
सा हँसते
हर पत्थर से बतियाते

तुम चिंतन के
शिखर चढ़ो
हम चिंताओं में उतरेंगे