Pratidin Ek Kavita

भूख | नरेश सक्सेना

भूख सबसे पहले दिमाग़ खाती है
उसके बाद आँखें

फिर जिस्म में बाक़ी बची चीज़ों को
छोड़ती कुछ भी नहीं है भूख

वह रिश्तों को खाती है
माँ का हो बहन या बच्चों का

बच्चे तो उसे बेहद पसंद हैं
जिन्हें वह सबसे पहले

और बड़ी तेज़ी से खाती है
बच्चों के बाद फिर बचता ही क्या है।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

भूख | नरेश सक्सेना

भूख सबसे पहले दिमाग़ खाती है
उसके बाद आँखें

फिर जिस्म में बाक़ी बची चीज़ों को
छोड़ती कुछ भी नहीं है भूख

वह रिश्तों को खाती है
माँ का हो बहन या बच्चों का

बच्चे तो उसे बेहद पसंद हैं
जिन्हें वह सबसे पहले

और बड़ी तेज़ी से खाती है
बच्चों के बाद फिर बचता ही क्या है।