Pratidin Ek Kavita

कोई एक को।  धीरज 

कोई एक को  कहूँगा
कि साथ चलेंगे,
मैं अकेला नही जाना चाहता पहाड़।

अकेले देखे जाने का डर
हमेशा लगता है,
पहाड़ को,
मुझको ।

हम जब भी मिले,
कोई एक को लेकर मिले
कि दोनों के अकेलेपन के मिल जाने का डर
हमेशा रहता है पहाड़ को और मुझको 

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

कोई एक को। धीरज

कोई एक को कहूँगा
कि साथ चलेंगे,
मैं अकेला नही जाना चाहता पहाड़।

अकेले देखे जाने का डर
हमेशा लगता है,
पहाड़ को,
मुझको ।

हम जब भी मिले,
कोई एक को लेकर मिले
कि दोनों के अकेलेपन के मिल जाने का डर
हमेशा रहता है पहाड़ को और मुझको