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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
क्या काम | मंगलेश डबराल
आप दिखते हैं बहुत उदास
आपको इस शहर में क्या काम
आपके भीतर भरा है ग़ुस्सा
आपको इस शहर में क्या काम
आप सफलता नहीं चाहते
नहीं चाहते ताक़त
जो मिल जाए उसे छोड़ कुछ नहीं माँगते
आपको इस शहर में क्या काम
आप तुरंत लपकते नहीं
और न खिलखिल करते
हाथ जेब में डाले चलते
रोज़ रात में पाते ख़ुद को लहूलुहान
आपको इस शहर में क्या काम।