Pratidin Ek Kavita

मौन । सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

बैठ लें कुछ देर,
आओ, एक पथ के पथिक-से

प्रिय, अंत और अनंत के,
तम-गहन-जीवन घेर।

मौन मधु हो जाए
भाषा मूकता की आड़ में,

मन सरलता की बाढ़ में,
जल-बिंदु-सा बह जाए।

सरल अति स्वच्छंद
जीवन, प्रात के लघुपात से,

उत्थान-पतनाघात से
रह जाए चुप, निर्द्वंद।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

मौन। सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

बैठ लें कुछ देर,
आओ, एक पथ के पथिक-से

प्रिय, अंत और अनंत के,
तम-गहन-जीवन घेर।

मौन मधु हो जाए
भाषा मूकता की आड़ में,

मन सरलता की बाढ़ में,
जल-बिंदु-सा बह जाए।

सरल अति स्वच्छंद
जीवन, प्रात के लघुपात से,

उत्थान-पतनाघात से
रह जाए चुप, निर्द्वंद।