कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
पीत कमल | नन्दकिशोर आचार्य
जल ही जल की
नीली-दर-नीली गहराई के नीचे
जमे हुए काले दलदल ही दलदल में
अपनी ही पूँछ पर सर टिका कर
सो रहा था वह :
उचटा अचानक
भूला हुआ कुछ कहीं जैसे सुगबुगाने लगे।
कुछ देर उन्मन, याद करता-सा
उसी बिसरी राग की धुन
जल के दबावों में कहीं घुटती हुई
एक-एक कर लगीं खुलने
सलवटें सारी
तरंग-सी व्याप गयी जल में :
अपनी ही पूँछ के बल खड़ा
झूमता था वह
फण खिला था राग की मानिन्द ।
ऊपर जल की नीली गहराई में से
फूट-फूट आते थे
पीत कमल !