Pratidin Ek Kavita

प्रक्रिया ।  केदारनाथ सिंह

मैं जब हवा की तरह
दृश्यों के बीच से गुज़रता हुआ

अकेला होता हूँ
तो क्षण भर के लिए

मुझे कहीं भी देखा जा सकता है
किसी भी दिशा से

किसी भी मोड़ पर
किसी भी भाषा के अज्ञात

शब्दकोश में
पर मैं

जब कहीं नहीं होता
सिर्फ़ कहीं होने की लगातार कोशिश में

सामने की भीड़ को
दूर से पहचानता हुआ

हवा के आर-पार
एक प्रश्न उछालता हूँ

और हँसता हूँ
तो न जाने क्यों

मुझे लगता है
कि गूँज-हीन शब्दों के इस घने अंधकार में

मैं—
अर्थ-परिवर्तन की

एक अबूझ प्रक्रिया हूँ
जिसके भीतर

ये लोग
झाड़ियाँ

बत्तख़ें और भविष्य
हर चीज़ एक-दूसरे में

घुली-मिली है
जड़ें रोशनी में हैं

रोशनी गंध में,
गंध विचारों में

विचार स्मृतियों में,
स्मृतियाँ रंगों में...

और मैं चुपचाप
इस संपूर्ण व्यतिक्रम को

भीतर सँभाले हुए
चलते-चलते

झुककर
रास्ते की धूल से

एक शब्द उठाता हूँ
और पाता हूँ कि अरे

गुलाब!


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

प्रक्रिया । केदारनाथ सिंह

मैं जब हवा की तरह
दृश्यों के बीच से गुज़रता हुआ

अकेला होता हूँ
तो क्षण भर के लिए

मुझे कहीं भी देखा जा सकता है
किसी भी दिशा से

किसी भी मोड़ पर
किसी भी भाषा के अज्ञात

शब्दकोश में
पर मैं

जब कहीं नहीं होता
सिर्फ़ कहीं होने की लगातार कोशिश में

सामने की भीड़ को
दूर से पहचानता हुआ

हवा के आर-पार
एक प्रश्न उछालता हूँ

और हँसता हूँ
तो न जाने क्यों

मुझे लगता है
कि गूँज-हीन शब्दों के इस घने अंधकार में

मैं—
अर्थ-परिवर्तन की

एक अबूझ प्रक्रिया हूँ
जिसके भीतर

ये लोग
झाड़ियाँ

बत्तख़ें और भविष्य
हर चीज़ एक-दूसरे में

घुली-मिली है
जड़ें रोशनी में हैं

रोशनी गंध में,
गंध विचारों में

विचार स्मृतियों में,
स्मृतियाँ रंगों में...

और मैं चुपचाप
इस संपूर्ण व्यतिक्रम को

भीतर सँभाले हुए
चलते-चलते

झुककर
रास्ते की धूल से

एक शब्द उठाता हूँ
और पाता हूँ कि अरे

गुलाब!