कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
बनाया है मैंने ये घर | रामदरश मिश्र
बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे
खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे-धीरे
किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला
कटा ज़िन्दगी का सफर धीरे-धीरे
जहाँ आप पहुँचे छलॉंगें लगा कर
वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे-धीरे
पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी
उठाता गया यों ही सर धीरे-धीरे
गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया
गया दर्द से घाव भर धीरे-धीरे
न हँस कर, न रोकर किसी में उड़ेला
पिया ख़ुद ही अपना ज़हर धीरे-धीरे
ज़मीं खेत की साथ लेकर चला था
उगा उसमें कोई शहर धीरे-धीरे
मिला क्या न मुझको ऐ दुनिया तुम्हारी
मुहब्बत मिली है अगर धीरे-धीरे