Pratidin Ek Kavita

पुरी का समुद्र | ज्ञानेन्द्रपति

आँखों में पुरी का समुद्र लिये जब लौटोगी
विस्मय -विस्फारित अपनी बड़री आँखों में
तरंग-विकल वह संयम-असमर्थ समुद्र
पछाड़ खाता, पुकारता, लीलने को आता
उद्द्वेलित, उद्दाम, हहाता

दष्टि-छोर तक फेला, फूला, फेनिल
टूट-टूट बिखर, तुम्हारे पैरों तले बिछ जाता
तुम्हें छोड़ जाता हुआ कुछ-कुछ गीला, कुछ-कुछ भीत
तुम्हारे कन्धों पर रख हाथ, तुम्हारी आँखों में झाँकता
मैं जानूँगा, अरे! यह तो मेरे मन का प्रतिबिम्ब है।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

पुरी का समुद्र | ज्ञानेन्द्रपति

आँखों में पुरी का समुद्र लिये जब लौटोगी
विस्मय -विस्फारित अपनी बड़री आँखों में
तरंग-विकल वह संयम-असमर्थ समुद्र
पछाड़ खाता, पुकारता, लीलने को आता
उद्द्वेलित, उद्दाम, हहाता

दष्टि-छोर तक फेला, फूला, फेनिल
टूट-टूट बिखर, तुम्हारे पैरों तले बिछ जाता
तुम्हें छोड़ जाता हुआ कुछ-कुछ गीला, कुछ-कुछ भीत
तुम्हारे कन्धों पर रख हाथ, तुम्हारी आँखों में झाँकता
मैं जानूँगा, अरे! यह तो मेरे मन का प्रतिबिम्ब है।