Pratidin Ek Kavita

अखबार | बालस्वरूप राही

जिस दिन होता है इतवार, 
घर में आते ही अखबार, 
ऐसी छीन-झपट मचती
हो जाते हैं हिस्से चार!
पापा को खबरों का चाव, 
माँ पढ़ती दालों के भाव,
भैया खेलों में रमते, 
भाता मुझे बनाना नाव

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

अखबार | बालस्वरूप राही

जिस दिन होता है इतवार,
घर में आते ही अखबार,
ऐसी छीन-झपट मचती
हो जाते हैं हिस्से चार!
पापा को खबरों का चाव,
माँ पढ़ती दालों के भाव,
भैया खेलों में रमते,
भाता मुझे बनाना नाव