Pratidin Ek Kavita

बुद्धू।शंख घोष
मूल बंगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल

कोई हो जाये यदि बुद्धू अकस्मात, यह तो
वह जान नहीं पाएगा खुद से। जान यदि पाता यह
फिर तो वह कहलाता बुद्धिमान ही।

तो फिर तुम बुद्धू नहीं हो यह तुमने
कैसे है लिया जान?

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

बुद्धू।शंख घोष
मूल बंगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल

कोई हो जाये यदि बुद्धू अकस्मात, यह तो
वह जान नहीं पाएगा खुद से। जान यदि पाता यह
फिर तो वह कहलाता बुद्धिमान ही।

तो फिर तुम बुद्धू नहीं हो यह तुमने
कैसे है लिया जान?