Pratidin Ek Kavita

मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ - शिवमंगल सिंह सुमन 

आज जो मैं इस तरह आवेश में हूँ, अनमना हूँ
यह न समझो मैं किसी के रक्त का प्यासा बना हूँ
सत्य कहता हूँ पराये पैर का काँटा कसकता
भूल से चींटी कहीं दब जाए भी तो 'हाय!' करता
पर जिन्होंने स्वार्थवश जीवन विषाक्त बना दिया है
कोटि-कोटि बुभुक्षितों का कौर तक, छिना लिया है
लाभ-शुभ लिखकर ज़माने का ह्रदय चूसा जिन्होंने 
और कल ही, बगल वाली लाश पर थूका जिन्होंने
बिलखते शिशु की व्यथा पर दृष्टि तक जिनने न फेरी
यदि क्षमा कर दूँ उन्हें, धिक्कार माँ की कोख मेरी
चाहता हूँ ध्वंस कर देना विषमता की कहानी
हो सुलभ सबको जगत में वस्त्र, भोजन, अन्न, पानी।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ - शिवमंगल सिंह सुमन

आज जो मैं इस तरह आवेश में हूँ, अनमना हूँ
यह न समझो मैं किसी के रक्त का प्यासा बना हूँ
सत्य कहता हूँ पराये पैर का काँटा कसकता
भूल से चींटी कहीं दब जाए भी तो 'हाय!' करता
पर जिन्होंने स्वार्थवश जीवन विषाक्त बना दिया है
कोटि-कोटि बुभुक्षितों का कौर तक, छिना लिया है
लाभ-शुभ लिखकर ज़माने का ह्रदय चूसा जिन्होंने
और कल ही, बगल वाली लाश पर थूका जिन्होंने
बिलखते शिशु की व्यथा पर दृष्टि तक जिनने न फेरी
यदि क्षमा कर दूँ उन्हें, धिक्कार माँ की कोख मेरी
चाहता हूँ ध्वंस कर देना विषमता की कहानी
हो सुलभ सबको जगत में वस्त्र, भोजन, अन्न, पानी।