Pratidin Ek Kavita

आओ, जल-भरे बरतन में । रघुवीर सहाय

आओ, जल-भरे बरतन में झाँकें
साँस से पानी में डोल उठेंगी दोनों छायाएँ

चौंककर हम अलग-अलग हो जाएँगे
जैसे अब, तब भी न मिलाएँगे आँखें, आओ

पैठी हुई शीतल जल में छाया साथ-साथ भीगे
झुके हुए ऊपर दिल की धड़कन-सी काँपे

करती हुई इंगित कभी हाँ के, कभी ना के
आओ जल-भरे बरतन में झाँके

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

आओ, जल-भरे बरतन में । रघुवीर सहाय

आओ, जल-भरे बरतन में झाँकें
साँस से पानी में डोल उठेंगी दोनों छायाएँ

चौंककर हम अलग-अलग हो जाएँगे
जैसे अब, तब भी न मिलाएँगे आँखें, आओ

पैठी हुई शीतल जल में छाया साथ-साथ भीगे
झुके हुए ऊपर दिल की धड़कन-सी काँपे

करती हुई इंगित कभी हाँ के, कभी ना के
आओ जल-भरे बरतन में झाँके