कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
बसन्त | केदारनाथ सिंह
और बसन्त फिर आ रहा है
शाकुन्तल का एक पन्ना
मेरी अलमारी से निकलकर
हवा में फरफरा रहा है
फरफरा रहा है कि मैं उठूँ
और आस-पास फैली हुई चीज़ों के कानों में
कह दूँ 'ना'
एक दृढ़
और छोटी-सी 'ना'
जो सारी आवाज़ों के विरुद्ध
मेरी छाती में सुरक्षित है
मैं उठता हूँ
दरवाज़े तक जाता हूँ
शहर को देखता हूँ
हिलाता हूँ हाथ
और ज़ोर से चिल्लाता हूँ –
ना...ना...ना
मैं हैरान हूँ
मैंने कितने बरस गँवा दिये
पटरी से चलते हुए
और दुनिया से कहते हुए
हाँ हाँ हाँ...