Pratidin Ek Kavita

उनके बाथरूम में ।  ज्ञानेन्द्रपति 

उनके बाथरूम में
वाशबेसिन के ऊपर लगे
आईने की छाँव में
रखे हैं दो टूथब्रश
एक लम्बूतरे प्याले में
बस माथ-भर दिखते
मुँह से मिलाए मुँह
दो टूथब्रश
जिस घनिष्ठता का
वे एक छायाचित्र हैं
वह पिचकी हुई ट्यूब में चिपकी हुई टूथपेस्ट-सी
बस
ज़रा-सी बची है
उनके मुँह भूल गए हैं चूमना एक-दूसरे को
उन दोनों के मुँह
दोमुँहेँ हो गए हैं
धीरे-धीरे
बेडरूम में और, ड्राइंगरूम में और
वहाँ, बाथरूम में
वाशबेसिन के ऊपर, आईने के छाँव-तले
एक लम्बूतरे प्याले में रखे उनके टूथब्रश
माथ-भर दिखते
एक-दूसरे के गले लगे खड़े हैं
अफसोस से भरे
आईना उनके अफसोस को दुगना कर रहा है ।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

उनके बाथरूम में । ज्ञानेन्द्रपति

उनके बाथरूम में
वाशबेसिन के ऊपर लगे
आईने की छाँव में
रखे हैं दो टूथब्रश
एक लम्बूतरे प्याले में
बस माथ-भर दिखते
मुँह से मिलाए मुँह
दो टूथब्रश
जिस घनिष्ठता का
वे एक छायाचित्र हैं
वह पिचकी हुई ट्यूब में चिपकी हुई टूथपेस्ट-सी
बस
ज़रा-सी बची है
उनके मुँह भूल गए हैं चूमना एक-दूसरे को
उन दोनों के मुँह
दोमुँहेँ हो गए हैं
धीरे-धीरे
बेडरूम में और, ड्राइंगरूम में और
वहाँ, बाथरूम में
वाशबेसिन के ऊपर, आईने के छाँव-तले
एक लम्बूतरे प्याले में रखे उनके टूथब्रश
माथ-भर दिखते
एक-दूसरे के गले लगे खड़े हैं
अफसोस से भरे
आईना उनके अफसोस को दुगना कर रहा है ।