Pratidin Ek Kavita

कोई सागर नहीं | भवानीप्रसाद मिश्र

कोई सागर नहीं है अकेलापन

न वन है
एक मन है अकेलापन

जिसे समझा जा सकता है
आर-पार जाया जा सकता है जिसके

दिन में सौ बार
कोई सागर नहीं है

न वन है
बल्कि एक मन है

हमारा तुम्हारा सबका अकेलापन!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

कोई सागर नहीं | भवानीप्रसाद मिश्र

कोई सागर नहीं है अकेलापन

न वन है
एक मन है अकेलापन

जिसे समझा जा सकता है
आर-पार जाया जा सकता है जिसके

दिन में सौ बार
कोई सागर नहीं है

न वन है
बल्कि एक मन है

हमारा तुम्हारा सबका अकेलापन!