Pratidin Ek Kavita

क़लम तेरे हाथ में है । भवानीप्रसाद मिश्र

क़लम तेरे हाथ में है, जो चाहे सो लिख
कुछ न सूझे तो अपना नाम लिख
क्या ज़रूरी है कि जो कुछ लिखा, वह छपे भी
न छपे सही अँगीठी के काम आएगा कभी

दम होगा तो धधक जाएगा
बोदा होगा तो बुझ जाएगा

लिखने की बेला बड़ी पावन होती है
सूखे मन के लिए सावन होती है
रोशनाई और क़लम का संयोग होता है
मन को सँजोने का प्राणान्तक योग होता है
क़लम तेरे हाथ में है, ललकार कर लिख
काग़ज़ हज़ार काले हों, मग़र कालिख़ न लिख।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

क़लम तेरे हाथ में है । भवानीप्रसाद मिश्र

क़लम तेरे हाथ में है, जो चाहे सो लिख
कुछ न सूझे तो अपना नाम लिख
क्या ज़रूरी है कि जो कुछ लिखा, वह छपे भी
न छपे सही अँगीठी के काम आएगा कभी

दम होगा तो धधक जाएगा
बोदा होगा तो बुझ जाएगा

लिखने की बेला बड़ी पावन होती है
सूखे मन के लिए सावन होती है
रोशनाई और क़लम का संयोग होता है
मन को सँजोने का प्राणान्तक योग होता है
क़लम तेरे हाथ में है, ललकार कर लिख
काग़ज़ हज़ार काले हों, मग़र कालिख़ न लिख।