Pratidin Ek Kavita

सिगरेट पीती हुई औरत | सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

पहली बार 
सिगरेट पीती हुई औरत 
मुझे अच्छी लगी। 
क्योंकि वह प्यार की बातें 
नहीं कर रही थी। 
—चारों तरफ़ फैलता धुआँ 
मेरे भीतर धधकती आग के 
बुझने का गवाह नहीं था। 
उसकी आँखों में 
एक अदालत थी : 
एक काली चमक 
जैसे कोई वकील उसके भीतर जिरह कर रहा हो 
और उसे सवालों का अनुमान ही नहीं 
उनके जवाब भी मालूम हों। 
वस्तुतः वह नहा कर आई थी 
किसी समुद्र में, 
और मेरे पास इस तरह बैठी थी 
जैसे धूप में बैठी हो। 
उस समय धुएँ का छल्ला 
समुद्र-तट पर गड़े छाते की तरह 
खुला हुआ था— 
तृप्तिकर, सुखविभोर, संतुष्ट, 
उसको मुझमें खोलता और बचाता भी।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

सिगरेट पीती हुई औरत | सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

पहली बार
सिगरेट पीती हुई औरत
मुझे अच्छी लगी।
क्योंकि वह प्यार की बातें
नहीं कर रही थी।
—चारों तरफ़ फैलता धुआँ
मेरे भीतर धधकती आग के
बुझने का गवाह नहीं था।
उसकी आँखों में
एक अदालत थी :
एक काली चमक
जैसे कोई वकील उसके भीतर जिरह कर रहा हो
और उसे सवालों का अनुमान ही नहीं
उनके जवाब भी मालूम हों।
वस्तुतः वह नहा कर आई थी
किसी समुद्र में,
और मेरे पास इस तरह बैठी थी
जैसे धूप में बैठी हो।
उस समय धुएँ का छल्ला
समुद्र-तट पर गड़े छाते की तरह
खुला हुआ था—
तृप्तिकर, सुखविभोर, संतुष्ट,
उसको मुझमें खोलता और बचाता भी।